भारत और पाकिस्तान में कश्मीर मुद्दे को लेकर तनाव है और आप निश्चित तौर पर इससे अनभिज्ञ नहीं होंगे, नेपाल इसे लेकर कितना चिंतित है?
आप
जानती होंगी कि नेपाल अभी सार्क का अध्यक्ष भी है. हमारा पूरा विश्वास है कि वहां जो कुछ विकास का काम है वो सही दिशा में आगे बढ़ेगा. इसकी वजह से
क्षेत्रीय शांति और स्थायित्व में कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा. हमारा
यह विश्वास है कि जितनी भी समस्याएं हैं उन समस्याओं का शांतिपूर्ण समाधान
है. इसलिए हम आग्रह करते हैं कि किसी भी पक्ष की तरफ़ से शांति-स्थायित्व
और देश-देश के बीच के संबंध पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कोई क़दम नहीं उठाया जाना चाहिए. सभी को क्षेत्रीय शांति और स्थायित्व में योगदान करना
होगा. हमारा विश्वास है कि भारत का जो सक्षम नेतृत्व है वो इस समस्या का सही ढंग से समाधान करने में कामयाब होगा.
नेपाल अपनी शुभकामना देता है. हमारे बहुत से नेपाली लोग वहां काम करते हैं और हम भारत सरकार के निकट संबंध में रहकर वहां की स्थिति का लगातार
जायज़ा ले रहे हैं. हमारे लिए संतोष की बात है कि सभी नेपाली लोग सुरक्षित
हैं और हमारा विश्वास है कि वहां कुछ भी ऐसा नहीं होगा जिससे उन्हें कोई
समस्या होगी. इसके अलावा जिस दिशा में भारत आगे बढ़ रहा है, विकास के उस
कदम पर हमारी ओर से उसे शुभकामना है. और जितनी भी भारत के प्रधानमंत्री
नरेंद्र मोदी की योजनाएं हैं वो सफलतापूर्वक आगे बढ़ें, यही हमारी शुभकामना
है और विश्वास भी.
मुझे लगता है कि दोनों देशों को आगे की ओर देखना है. भविष्य में देखना
है. बीते वक़्त में जो कुछ हुआ वो इतिहास हो गया. हमें भविष्य की ओर देखते
हुए आगे बढ़ना होगा क्योंकि भारत और नेपाल के संबंध इतने बहुआयामी हैं,
इतनी निर्भरता है कि हमें संयुक्त रूप से आगे बढ़ना ही होगा. इसका कोई विकल्प नहीं है. दोनों देशों का भविष्य और हित इसी में है कि हम नए नजरिए
के साथ आगे बढ़ें और हम बढ़ रहे भी हैं. मुझे लगता है कि विगत में जो कुछ भी हुआ उसकी कोई परछाई अब नहीं पड़ेगी. लेकिन ये ज़रूर है कि उससे सबक तो
ज़रूर सीखना होगा. दोनों देशों को इस बात का बोध भी है लेकिन अब बीती बात को और पीछे मुड़कर नहीं देखना है. आगे देखना होगा.
हम पारस्परिक सहयोग के सभी मुद्दों पर बात करेंगे. लेकिन आर्थिक
साझेदारी पर ख़ासकर बात होगी. इसके अलावा व्यापारिक घाटे से जूझ रहे नेपाल
को कम करने पर भी बात होगी. हम उम्मीद करते हैं कि दोनों देशों के बीच के संबंध इस बैठक से और बेहतर होंगे.
हम भारत की इस स्थिति को समझते हैं. हम यहां भारत के दूतावास के संपर्क में हैं और भारत में नेपाल का दूतावास भी भारत सरकार के संपर्क में है.
हमारी शुभेच्छा भी हम भारत के साथ साझा कर चुके हैं.
मुझे लगता है कि यह चिंता करने की कोई ज़रूरत नहीं है. भारत और चीन
नेपाल के दो पड़ोसी हैं और हम पड़ोसियों की तुलना नहीं करते हैं. लेकिन
भारत से जो हमारा बहुआयामी संबंध है उसकी किसी से तुलना नहीं होती और हम किसी से तुलना करना भी नहीं चाहते हैं. इसलिए नेपाल अगर अपने दूसरे देशों
से संबंध बढ़ाता है तो भारत को समझना चाहिए और वे समझते भी हैं कि ये भारत
के हित के विपरीत नहीं है. नेपाल अपने मित्र देशों के हित के ख़िलाफ़ कोई क़दम नहीं उठाता और ना ही कोई ऐसी गतिविधि होने देता है. इसलिए हमारे और
दूसरे देशों के संबंधों की वजह से कोई भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है और मुझे लगता है कि भारत का नेतृत्व इसे बख़ूबी समझता भी है.
Tuesday, August 20, 2019
Wednesday, June 26, 2019
फ़िल्म रिव्यूः कैसी है टाइगर श्रॉफ, अनन्या पांडे की स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर 2
'एवेंजर्स एंडगेम' की दीवानगी का आलम यह है कि इस फिल्म ने भारत में एक सप्ताह में 250 करोड़ रूपये से अधिक का
नेट कलेक्शन करके हॉलीवुड की अब तक की तमाम फिल्मों को पीछे छोड़ दिया है.
साथ ही 'एंडगेम' कई बड़ी हिंदी फिल्मों को भी अंगूठा दिखाते हुए आगे बढ़ गई है. लेकिन हॉलीवुड के कई सुपर हीरोज वाली यह फिल्म, दौलत का पहाड़ खड़ा करने के बावजूद हमारे एक भारतीय सुपर हीरो 'बाहुबली' को नहीं पछाड़ सकी है.
भारत में यह एक 'बाहुबली' आज भी बीस सुपर हीरो पर भारी है.
हॉलीवुड ने यूँ तो पहले भी ऐसी कई फ़िल्में दी हैं जिनकी दीवानगी दर्शकों में देखते ही बनती है.
भारत में भी हॉलीवुड फिल्मों का दर्शकों में इतना क्रेज़ है कि वहां की फिल्मों को जल्द से जल्द देखने के लिए दर्शक उतावले रहते हैं.
लेकिन हालिया प्रदर्शित फिल्म 'एवेंजर्स एंडगेम' ने अपने प्रदर्शन के पहले दिन से ही लोकप्रियता और सफलता के जो नए आयाम बनाये हैं उन्हें देखकर सब दंग हैं.
देखा जाए तो 'एवेंजर्स एंडगेम' ने भारत में 26 अप्रैल को रिलीज़ होने से पहले ही सभी को अपने मोहपाश में ऐसा बाँधा कि फिल्म की एडवांस बुकिंग में ही इसके 10 लाख टिकट बिकने से सभी जगह हाउसफुल के बोर्ड लग गए. इसी के चलते फिल्म की ओपनिंग ने ही वह धमाल कर दिखाया, जो पहले कभी नहीं हुआ था.
'एंडगेम' ने भारत में पहले दिन ही 53 करोड़ 50 लाख रूपये का नेट बिजनेस किया तो सभी की आँखें खुली की खुली रह गयीं.
इससे भारत में रिलीज़ हुयी अभी तक की सभी हॉलीवुड फिल्मों के तमाम पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए.
हालांकि, सफलता का यह नया रिकॉर्ड सिर्फ एक दिन के लिए नहीं बना, सफलता का यह सिलसिला एक सप्ताह होने के बाद अभी तक जारी है.
बॉक्स ऑफिस इंडिया के आंकड़ों के अनुसार फिल्म ने प्रदर्शन के दूसरे दिन शनिवार 27 अप्रैल को 52 लाख और तीसरे दिन रविवार को फिर से 53 लाख 50 हज़ार रूपये की कमाई कर बता दिया कि बॉलीवुड के देश में इस बार हॉलीवुड कुछ और भी बड़े धमाके करके ही दम लेगा.
क्योंकि पहले तीन दिन यानी वीकएंड के इस कलेक्शन से 'एवेंजर्स एंडगेम' ने कुल लगभग 159 करोड़ रूपये की कमाई करके सफलता का नया इतिहास लिख दिया.
और अब तो सिर्फ 6 दिन में भारत में इस फिल्म ने लगभग 244 करोड़ रूपये का नेट बिजनेस करके बाज़ी पूरी तरह अपने नाम कर ली है.
अब एक सप्ताह होने पर फिल्म का 250 करोड़ रूपये कलेक्शन का आंकड़ा पार करना इस फिल्म के लिए सोने पर सुहागा है.
एक सप्ताह में 250 करोड़ रूपये से ज्यादा की कमाई करना अभी तक बड़े बड़ी हिंदी फिल्मों के लिए भी दूर की कौड़ी रही है.
फिल्म 'एवेंजर्स एंडगेम' की सफलता की एक बड़ी बात यह भी है कि इस फिल्म ने भारत में प्रदर्शित हॉलीवुड की सभी फिल्मों के रिकॉर्ड तोड़ने के साथ हमारे यहाँ बॉक्स ऑफिस के बादशाह और सुलतान माने जाने वाले दिग्गज सितारों की फिल्मों के रिकॉर्ड भी तोड़ दिए.
भारत में बॉलीवुड की जिस फिल्म ने अब तक सबसे बड़ी ओपनिंग ली है वह फिल्म है 'ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तां'.
अमिताभ बच्चन और आमिर खान की यह फिल्म जब दीवाली के मौके पर पिछले बरस 8 नवम्बर को रिलीज़ हुई, तब इसने पहले दिन ही 52.25 करोड़ रूपये का नेट कलेक्शन करके तहलका मचा दिया था.
इतनी बड़ी ओपनिंग इंडियन सिनेमा के इतिहास में इससे पहले किसी को नहीं मिली थी. लेकिन इस टॉप रिकॉर्ड के बाद 'ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तां' ने अगले दिन बॉक्स ऑफिस पर धराशायी होने का भी एक रिकॉर्ड बना दिया.
इतनी बम्पर ओपनिंग के बाद दूसरे दिन इस फिल्म ने बड़ी मुश्किल से करीब 29 करोड़ का ही बिजनेस किया वह भी इसलिए कि दूसरे दिन की टिकट एडवांस में बिक चुकी थीं और अब थिएटर वाले उन टिकटों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं थे.
'ठग्स'...से पहले सबसे बड़ी ओपनिंग का रिकॉर्ड शाहरुख़ खान की 'हैपी न्यू इयर' के नाम था जिसने पहले दिन करीब करीब 45 करोड़ रूपये का नेट बिजनेस किया था.
ज़ाहिर है 'एंडगेम' ने भारत के बड़े बड़े सितारों और उनकी बड़ी बड़ी फिल्मों का एंडगेम कर दिया है.
Tuesday, May 28, 2019
चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम
शहर में चार दशकों से काम कर रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद भार्गव कहते हैं कि गुना-शिवपुरी की जनता को 'राजा को हर हाल में जिताने' की सामाजिक-मानसिक कंडिशनिंग से निकलने में वक़्त लगा है. लेकिन 2019 के नतीजे
यह साफ़ बताते हैं कि अब लोग बैलेट बॉक्स में अपने और अपने शहर के विकास के लिए नए विकल्पों पर निडर होकर वोट दे रहे हैं.
इन नतीजों को 'महल' की पहली हार बताते हुए भार्गव कहते हैं, "यहां कांग्रेस की हार महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि विजयाराजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया समेत इस परिवार के कई लोग यहां भाजपा से भी खड़े हुए और जीते. माहौल ऐसा था कि 'महल' का आदमी जहाँ से भी खड़ा हो जाएगा, जिस भी पार्टी से खड़ा हो जाएगा, जीतना तो उसका तय है. ऐसे में ज्योतिरादित्य का पहली बार हारना और वो भी इतने बड़े अंतर से, वाकई यहां की राजनीति में आया एक निर्णायक मोड़ है."
सिंधिया की हार के कारण बताते हुए वो जोड़ते हैं, "यहां विकास के लिए सिंधिया ने बहुत कोशिश की. जैसे कि वो यहां सीवर प्रोजेक्ट लाए, मणीखेड़ा डैम का प्रस्ताव लाए और एक मेडिकल कॉलेज खोलने का प्रस्ताव भी पारित किया. लेकिन कोई भी काम पूरा नहीं हो पाया."
"सीवर प्रोजेक्ट की वजह से 4 साल से यह शहर धूल में डूबा रहा, तीन लोगों की सीवर में मौत हो गयी, सड़कें खुदी रही लेकिन प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ. यही सारे अधूरे काम चुनाव के वक़्त सिंधिया जी के गले की फाँस बन गए और फिर यह कृषि प्रधान इलाक़ा है, किसानों के लिए इन्होंने कुछ नहीं किया."
"इनके पास भाषणों में बोलने के लिए कुछ नहीं था. दूसरी तरफ़ भाजपा ने इनके ख़िलाफ़ ख़ूब महौल बनाया. वाणिज्य मंत्री रह चुके हैं, चार बार से सांसद हैं फिर क्यों नहीं इलाक़े के लिए कुछ किया - जैसी बातें यहां ख़ूब तैर रही थीं."
प्रमोद आगे सिंधिया परिवार द्वारा कभी जनता से भाजपा तो कभी कांग्रेस को वोट देने की अपील को भी उनके ख़िलाफ़ जाता हुआ बताते हैं.
"जब यशोधरा भाजपा से विधानसभा चुनाव लड़ती हैं तो ज्योतिरादित्य कांग्रेस के पक्ष में बिल्कुल प्रचार नहीं करते. बल्कि महल की तरफ़ से लोगों से अपील की जाती है कि भाजपा को वोट दें. फिर जब उसी महल के ज्योतिरादित्य लोकसभा का चुनाव लड़ते हैं तो यशोधरा को अपनी पार्टी भाजपा के पक्ष में बिल्कुल प्रचार नहीं करती. उल्टा महल की तरफ़ से अब लोगों से पंजे पर मुहर लगाने की अपील की जाती है."
प्रमोद जोड़ते हैं कि इतने सालों में आम जनता यह समझ गयी है कि 'महल' के सारे लोग एक हैं.
"इसलिए अगर उन्हें अपने लिए विकास चुनना है तो महल से इतर, काम के हिसाब से प्रतिनिधि चुनना होगा. क्योंकि सिंधिया जी तो महाराज है. बच्चे का एडमिशन हो या किसी का ट्रांसफर हो- ऐसी रोज़मर्रा के लोगों के सैकड़ों ज़रूरी कामों की दरख्वास्त को वो ले लेते हैं लेकिन आगे कुछ नहीं करवाते क्योंकि उन्हें यह काम छोटे लगते हैं."
"साथ ही ज्योतिरादित्य का व्यवहार अपने पिता से बहुत अलग हैं. लोग उनसे मिलने महल पर जाते हैं तो तीन-चार घंटे इंतज़ार करना पड़ता है. इसलिए जनता का नाता भी राज परिवार से टूटता जा रहा है. अब वह अपने लिए अपने काम करवा पाने वाले और विकास पर ध्यान देने वाले प्रतिनिधि चुन रही है."
शिवपुरी-गुना सीट पर भाजपा का चुनाव प्रचार संभालने वाले राजू बाथम कहते हैं कि विधान सभा के नतीजों के बाद ही उनकी पार्टी को अंदाज़ा हो गया था कि सिंधिया लोकसभा में हारेंगे.
"इस लोकसभा सीट में प्रदेश की 8 विधानसभा सीटें आती हैं. हमने सभी सीटों पर भाजपा को मिले वोटों को जोड़ा तो देखा हमें इन सीटों पर कांग्रेस से 16400 अधिक मत मिले थे. उसी से हमें अंदाज़ा हो गया कि जनता का मूड कैसा है. बाक़ी यह राष्ट्रीय चुनाव था और मोदी जी को लेकर लोगों में उत्साह और प्यार है. इसलिए मोदी लहर में भी इस बार गुना लोकसभा सीट पर भाजपा को यह ऐतिहासिक जीत मिली है."
उधर, कांग्रेस के ज़िला अध्यक्ष बैजनाथ सिंह यादव भी इस जीत के लिए 'मोदी लहर' को ही दोष देते हैं.
बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "मोदी लहर की वजह से हम हार गए. उसके साथ ही वो प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनवाए गए हैं, उससे भी हमारे वोट भाजपा की तरफ़ मुड़ गए. वरना सिंधिया जी जैसे ईमानदार और जनता के लिए काम करने वाले नेता कभी नहीं हारते."
स्थानीय पत्रकार अजय खेमारिया कहते हैं कि भाजपा की इतनी प्रचंड जीत का अंदाज़ा यहां कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा को भी नहीं था.
"सिंधिया के साथ-साथ भाजपा के स्थानीय लोग भी यह ठीक से नहीं भांप पाए थे कि इस बार मोदी की अंडरकरेंट कितनी मज़बूत है."
"सिंधिया जी बीते चार चुनावों से जीत रहे हैं और कहने को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के जनरल सेक्रेटरी भी हैं. लेकिन अगर आप गुना शिवपुरी में ढूँढने जाएँ तो आपको कांग्रेस का कोई कैडर ही नहीं मिलेगा. जो पुराना कैडर था, वह इनके चुनाव प्रचार तक में नहीं उतरा और इनके 'फॉलोअर' सोचते रह गए कि महाराज तो ऐसे ही जीत जाएंगे, काम करने की क्या ज़रूरत है."
वे ये भी कहते हैं कि कांग्रेस को दिग्विजय सिंह के गुट और सिंधिया परिवार के गुट की अनबन का भी नुक़सान हुआ.
वे कहते हैं, " विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी भिंड, मुरैना और ग्वालियर में तीन सभाएँ करने गए थे. लेकिन उनमें से एक में भी सिंधिया जी जाकर उनके साथ खड़े नहीं हुए और न ही बाद में कभी उन प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार किया, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन सीटों पर टिकट उनके मन मुताबिक़ नहीं दिए गए थे. "
देर शाम जब मैं सिंधिया परिवार की ऐतिहासिक धरोहर 'सिंधिया छतरी' का माहौल देखने गयी तो वहां स्थानीय लोगों को टिकट बाँट रहे चौकीदार ने नतीजों के बारे में चर्चा करते हुए कहा, "अब तो लगता है, वाकई जनता ही राजा है. आख़िर हमारे महाराज को जो हरा दिया."
इन नतीजों को 'महल' की पहली हार बताते हुए भार्गव कहते हैं, "यहां कांग्रेस की हार महत्वपूर्ण नहीं क्योंकि विजयाराजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया समेत इस परिवार के कई लोग यहां भाजपा से भी खड़े हुए और जीते. माहौल ऐसा था कि 'महल' का आदमी जहाँ से भी खड़ा हो जाएगा, जिस भी पार्टी से खड़ा हो जाएगा, जीतना तो उसका तय है. ऐसे में ज्योतिरादित्य का पहली बार हारना और वो भी इतने बड़े अंतर से, वाकई यहां की राजनीति में आया एक निर्णायक मोड़ है."
सिंधिया की हार के कारण बताते हुए वो जोड़ते हैं, "यहां विकास के लिए सिंधिया ने बहुत कोशिश की. जैसे कि वो यहां सीवर प्रोजेक्ट लाए, मणीखेड़ा डैम का प्रस्ताव लाए और एक मेडिकल कॉलेज खोलने का प्रस्ताव भी पारित किया. लेकिन कोई भी काम पूरा नहीं हो पाया."
"सीवर प्रोजेक्ट की वजह से 4 साल से यह शहर धूल में डूबा रहा, तीन लोगों की सीवर में मौत हो गयी, सड़कें खुदी रही लेकिन प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ. यही सारे अधूरे काम चुनाव के वक़्त सिंधिया जी के गले की फाँस बन गए और फिर यह कृषि प्रधान इलाक़ा है, किसानों के लिए इन्होंने कुछ नहीं किया."
"इनके पास भाषणों में बोलने के लिए कुछ नहीं था. दूसरी तरफ़ भाजपा ने इनके ख़िलाफ़ ख़ूब महौल बनाया. वाणिज्य मंत्री रह चुके हैं, चार बार से सांसद हैं फिर क्यों नहीं इलाक़े के लिए कुछ किया - जैसी बातें यहां ख़ूब तैर रही थीं."
प्रमोद आगे सिंधिया परिवार द्वारा कभी जनता से भाजपा तो कभी कांग्रेस को वोट देने की अपील को भी उनके ख़िलाफ़ जाता हुआ बताते हैं.
"जब यशोधरा भाजपा से विधानसभा चुनाव लड़ती हैं तो ज्योतिरादित्य कांग्रेस के पक्ष में बिल्कुल प्रचार नहीं करते. बल्कि महल की तरफ़ से लोगों से अपील की जाती है कि भाजपा को वोट दें. फिर जब उसी महल के ज्योतिरादित्य लोकसभा का चुनाव लड़ते हैं तो यशोधरा को अपनी पार्टी भाजपा के पक्ष में बिल्कुल प्रचार नहीं करती. उल्टा महल की तरफ़ से अब लोगों से पंजे पर मुहर लगाने की अपील की जाती है."
प्रमोद जोड़ते हैं कि इतने सालों में आम जनता यह समझ गयी है कि 'महल' के सारे लोग एक हैं.
"इसलिए अगर उन्हें अपने लिए विकास चुनना है तो महल से इतर, काम के हिसाब से प्रतिनिधि चुनना होगा. क्योंकि सिंधिया जी तो महाराज है. बच्चे का एडमिशन हो या किसी का ट्रांसफर हो- ऐसी रोज़मर्रा के लोगों के सैकड़ों ज़रूरी कामों की दरख्वास्त को वो ले लेते हैं लेकिन आगे कुछ नहीं करवाते क्योंकि उन्हें यह काम छोटे लगते हैं."
"साथ ही ज्योतिरादित्य का व्यवहार अपने पिता से बहुत अलग हैं. लोग उनसे मिलने महल पर जाते हैं तो तीन-चार घंटे इंतज़ार करना पड़ता है. इसलिए जनता का नाता भी राज परिवार से टूटता जा रहा है. अब वह अपने लिए अपने काम करवा पाने वाले और विकास पर ध्यान देने वाले प्रतिनिधि चुन रही है."
शिवपुरी-गुना सीट पर भाजपा का चुनाव प्रचार संभालने वाले राजू बाथम कहते हैं कि विधान सभा के नतीजों के बाद ही उनकी पार्टी को अंदाज़ा हो गया था कि सिंधिया लोकसभा में हारेंगे.
"इस लोकसभा सीट में प्रदेश की 8 विधानसभा सीटें आती हैं. हमने सभी सीटों पर भाजपा को मिले वोटों को जोड़ा तो देखा हमें इन सीटों पर कांग्रेस से 16400 अधिक मत मिले थे. उसी से हमें अंदाज़ा हो गया कि जनता का मूड कैसा है. बाक़ी यह राष्ट्रीय चुनाव था और मोदी जी को लेकर लोगों में उत्साह और प्यार है. इसलिए मोदी लहर में भी इस बार गुना लोकसभा सीट पर भाजपा को यह ऐतिहासिक जीत मिली है."
उधर, कांग्रेस के ज़िला अध्यक्ष बैजनाथ सिंह यादव भी इस जीत के लिए 'मोदी लहर' को ही दोष देते हैं.
बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "मोदी लहर की वजह से हम हार गए. उसके साथ ही वो प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर बनवाए गए हैं, उससे भी हमारे वोट भाजपा की तरफ़ मुड़ गए. वरना सिंधिया जी जैसे ईमानदार और जनता के लिए काम करने वाले नेता कभी नहीं हारते."
स्थानीय पत्रकार अजय खेमारिया कहते हैं कि भाजपा की इतनी प्रचंड जीत का अंदाज़ा यहां कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा को भी नहीं था.
"सिंधिया के साथ-साथ भाजपा के स्थानीय लोग भी यह ठीक से नहीं भांप पाए थे कि इस बार मोदी की अंडरकरेंट कितनी मज़बूत है."
"सिंधिया जी बीते चार चुनावों से जीत रहे हैं और कहने को ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के जनरल सेक्रेटरी भी हैं. लेकिन अगर आप गुना शिवपुरी में ढूँढने जाएँ तो आपको कांग्रेस का कोई कैडर ही नहीं मिलेगा. जो पुराना कैडर था, वह इनके चुनाव प्रचार तक में नहीं उतरा और इनके 'फॉलोअर' सोचते रह गए कि महाराज तो ऐसे ही जीत जाएंगे, काम करने की क्या ज़रूरत है."
वे ये भी कहते हैं कि कांग्रेस को दिग्विजय सिंह के गुट और सिंधिया परिवार के गुट की अनबन का भी नुक़सान हुआ.
वे कहते हैं, " विधानसभा चुनावों में राहुल गांधी भिंड, मुरैना और ग्वालियर में तीन सभाएँ करने गए थे. लेकिन उनमें से एक में भी सिंधिया जी जाकर उनके साथ खड़े नहीं हुए और न ही बाद में कभी उन प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार किया, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन सीटों पर टिकट उनके मन मुताबिक़ नहीं दिए गए थे. "
देर शाम जब मैं सिंधिया परिवार की ऐतिहासिक धरोहर 'सिंधिया छतरी' का माहौल देखने गयी तो वहां स्थानीय लोगों को टिकट बाँट रहे चौकीदार ने नतीजों के बारे में चर्चा करते हुए कहा, "अब तो लगता है, वाकई जनता ही राजा है. आख़िर हमारे महाराज को जो हरा दिया."
Wednesday, May 15, 2019
दोनों पार्टियों के बीच मतभेद?
इस संदर्भ में जब हमने हापुड़ ज़िले के पुलिस अधीक्षक यशवीर सिंह से बात की तो उन्होंने कहा कि दस हज़ार रुपये में सौदे की बात जो सामने आई है
उसका अभी तक कोई प्रमाण नहीं है.
यशवीर सिंह बताते हैं कि पुलिस ने गीता द्वारा बताए गए अलग-अलग रेप की घटनाओं की जांच करवाई है लेकिन ऐसी कोई भी बात अभी तक प्रमाणित नहीं हुई है.
जब हमने यशवीर सिंह से पूछा कि क्या यह आरोप सही है कि गीता की एफ़आईआर नहीं लिखी गई थी तो उन्होंने बताया कि पूर्व में गीता के ख़िलाफ़ भी कई मामले आए हैं और ख़ुद गीता ने भी कई बार अलग-अलग लोगों पर एफ़आईआऱ दर्ज करवाई है. लेकिन दोनों ही प्रकरण जांच के बाद झूठे पाए गए.
हालांकि उन्होंने ये ज़रूर कहा कि मामला संदिग्ध है और अभी भी जांच के दायरे में है.
गांव वालों की प्रतिक्रिया
जिस वक़्त हम श्यामपुरजट्ट गांव पहुंचे, गांव लगभग ख़ाली था. एक गुमटी पर कुछ लोग मौजूद थे जिनसे हमने गीता-विनोद-भुवन के बारे में पूछा तो उन्होंने पहले तो बात करने से इनक़ार दिया लेकिन पहचान ज़ाहिर न करने का आश्वासन देने पर बात की.
इस संदर्भ में जब हमने हापुड़ ज़िले के पुलिस अधीक्षक यशवीर सिंह से बात की तो उन्होंने कहा कि दस हज़ार रुपये में सौदे की बात जो सामने आई है उसका अभी तक कोई प्रमाण नहीं है.
यशवीर सिंह बताते हैं कि पुलिस ने गीता द्वारा बताए गए अलग-अलग रेप की घटनाओं की जांच करवाई है लेकिन ऐसी कोई भी बात अभी तक प्रमाणित नहीं हुई है.
जब हमने यशवीर सिंह से पूछा कि क्या यह आरोप सही है कि गीता की एफ़आईआर नहीं लिखी गई थी तो उन्होंने बताया कि पूर्व में गीता के ख़िलाफ़ भी कई मामले आए हैं और ख़ुद गीता ने भी कई बार अलग-अलग लोगों पर एफ़आईआऱ दर्ज करवाई है. लेकिन दोनों ही प्रकरण जांच के बाद झूठे पाए गए.
हालांकि उन्होंने ये ज़रूर कहा कि मामला संदिग्ध है और अभी भी जांच के दायरे में है.
गांव वालों की प्रतिक्रिया
जिस वक़्त हम श्यामपुरजट्ट गांव पहुंचे, गांव लगभग ख़ाली था. एक गुमटी पर कुछ लोग मौजूद थे जिनसे हमने गीता-विनोद-भुवन के बारे में पूछा तो उन्होंने पहले तो बात करने से इनक़ार दिया लेकिन पहचान ज़ाहिर न करने का आश्वासन देने पर बात की.
मार्च 2014: "हमारा अभियान स्पष्ट है, बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए."
अगस्त 2015: "बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं देना मोदी सरकार का धोखा."
अगस्त 2016: "जब तक बिहार जैसे पिछड़े राज्य को विशेष दर्जा नहीं दिया जाएगा, राज्य का सही विकास संभव नहीं है."
अगस्त 2017: "पीएम मोदी के मुकाबले कोई नहीं", पार्टी ने इस दौरान विशेष दर्जा के मुद्दे पर अघोषित चुप्पी साधी!
मई 2019: "ओडिशा के साथ-साथ बिहार और आंध्र प्रदेश
बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के मुद्दे पर नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का स्टैंड पिछले पांच सालों में कुछ इस तरह बदला है.
इस दौरान बिहार की सत्ता पर नीतीश कुमार ही काबिज़ रहे, हालांकि केंद्र में सरकारें बदलीं और राज्य में उनकी सरकार के सहयोगी भी.
संयोग यह रहा कि जब भी जदयू विशेष दर्जा के मुद्दे पर आक्रामक हुई, केंद्र और राज्य में अलग-अलग गठबंधन की सरकारें रहीं और जब दोनों जगहों पर एनडीए की समान सरकार बनी तो पार्टी ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली.
अब लोकसभा चुनाव के छह चरण बीत जाने के बाद पार्टी ने एक बार फिर से राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने का राग अलापा है.
जदयू के महासचिव और प्रवक्ता केसी त्यागी ने इस बार बिहार के साथ-साथ ओडिशा और आंध्र प्रदेश को भी विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की है.
उन्होंने सोमवार को एक बयान जारी कर कहा, "साल 2000 में बिहार के विभाजन के बाद राज्य से प्राकृतिक संसाधनों के भंडार और उद्योग छिन गए. राज्य का विकास जैसे होना चाहिए था, नहीं हुआ. अब समय आ गया है कि केंद्रीय वित्त आयोग इस मुद्दे पर फिर से विचार करे."
फ़िलहाल केंद्र और राज्य में समान गठबंधन की सरकार है और लोकसभा चुनाव चल रहे हैं. ऐसे में जदयू के इस बयान से राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है. तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं.
19 मई को अंतिम चरण में बिहार की आठ सीटों पर मतदान होने हैं. और नीतीश कुमार के विरोधियों का कहना है कि वो एक बार फिर पलटी मारने की तैयारी कर रहे हैं.
वहीं जानकार इसे "सुविधा की राजनीति" के तौर पर देख रहे हैं. हालांकि जदयू इन सभी अशंका और आरोपों को खारिज कर रही है और भाजपा के साथ अपने रिश्ते को कायम रखने की प्रतिबद्धता जता रही है.
केसी त्यागी ने बीबीसी से कहा कि वे ओडिशा के साथ-साथ आंध्र प्रदेश को भी विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के समर्थक हैं, जिसकी हालत बंटवारे के बाद बिगड़ गई और जगनमोहन रेड्डी के विशेष राज्य के दर्जे की मांग का भी समर्थन करते हैं.
हाल ही में फणी तूफ़ान ने ओडिशा को काफी नुकसान पहुंचाया, इसके बाद वहां के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने केंद्र से राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई.
वहीं, आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी तेलुगू देशम पार्टी और विपक्ष के नेता जगनमोहन रेड्डी भी राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग पहले से करते रहे हैं.
इसी मुद्दे पर पिछले साल मार्च के महीने में तेलगू देशम पार्टी केंद्र में एनडीए गठबंधन से अलग हो गई थी जो कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से ही एनडीए के साथ रही थी.
केसी त्यागी के इस बयान पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए एक बार फिर पलटी मारने की आशंका जताई है.
पार्टी प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने बीबीसी से कहा, "जनता के मन में जो संशय हैं, उसकी पृष्ठभूमि तैयार हो रही है. पलटी मारना नीतीश कुमार की फितरत है, उन्हें इसका अनुभव प्राप्त है. जदयू को लग रहा है कि देश में भाजपा की सरकार नहीं लौटने वाली है, इसलिए वो यह मुद्दा उठा रहे हैं."
नवंबर 2015 में बिहार में जदयू ने राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर राज्य में तीसरी बार सरकार बनाई थी. जुलाई 2017 में जदयू ने आरजेडी का साथ छोड़ एनडीए में फिर से आने का फ़ैसला किया था तब से इस मांग को लेकर वो ख़ामोश थी.
चुनाव के आख़िरी चरण में जदयू की इस मांग को नीतीश कुमार की दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है.
जानकारों का मानना है कि विशेष राज्य के मुद्दे को फिर से उठना भाजपा को असहज स्थिति में डाल सकता है क्योंकि पार्टी के बड़े नेता और वित्तमंत्री अरूण जेटली पहले ही विशेष दर्जे की मांग को ख़ारिज करते हुए कह चुके हैं कि ऐसी मांगों का दौर समाप्त हो चुका है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राजद का आरोप सही साबित होगा और जदयू भी टीडीपी की राह चलेगी, इस सवाल पर केसी त्यागी कहते हैं, "हम भाजपा के साथ गठबंधन भी रखेंगे और अपनी मांग भी जारी रखेंगे. हमारी यह मांग बहुत पुरानी है. 2004 से यह मांग हम कर रहे हैं. नया प्रसंग नवीन पटनायक के बयान के बाद शुरू हुआ है, हमने अपनी मांग को सिर्फ़ दोहराया है."
लेकिन भाजपा अब आपकी सहयोगी है, फिर क्यों नहीं मिला विशेष राज्य का दर्जा, इस सवाल का जवाब केसी त्यागी थोड़ी खीझ के साथ देते हैं, "अभी चुनाव चल रहा है, आप कैसी बात कर रहे हैं कि जैसे आज हमने मांग उठाई और कल को दर्जा मिल जाएगा. ज़रूरी नहीं है कि हर मांग मानी जाए, ज़रूरी नहीं है कि हम हर मांग को उठाना छोड़ दे."
को भी मिले विशेष राज्य का दर्जा."
यशवीर सिंह बताते हैं कि पुलिस ने गीता द्वारा बताए गए अलग-अलग रेप की घटनाओं की जांच करवाई है लेकिन ऐसी कोई भी बात अभी तक प्रमाणित नहीं हुई है.
जब हमने यशवीर सिंह से पूछा कि क्या यह आरोप सही है कि गीता की एफ़आईआर नहीं लिखी गई थी तो उन्होंने बताया कि पूर्व में गीता के ख़िलाफ़ भी कई मामले आए हैं और ख़ुद गीता ने भी कई बार अलग-अलग लोगों पर एफ़आईआऱ दर्ज करवाई है. लेकिन दोनों ही प्रकरण जांच के बाद झूठे पाए गए.
हालांकि उन्होंने ये ज़रूर कहा कि मामला संदिग्ध है और अभी भी जांच के दायरे में है.
गांव वालों की प्रतिक्रिया
जिस वक़्त हम श्यामपुरजट्ट गांव पहुंचे, गांव लगभग ख़ाली था. एक गुमटी पर कुछ लोग मौजूद थे जिनसे हमने गीता-विनोद-भुवन के बारे में पूछा तो उन्होंने पहले तो बात करने से इनक़ार दिया लेकिन पहचान ज़ाहिर न करने का आश्वासन देने पर बात की.
इस संदर्भ में जब हमने हापुड़ ज़िले के पुलिस अधीक्षक यशवीर सिंह से बात की तो उन्होंने कहा कि दस हज़ार रुपये में सौदे की बात जो सामने आई है उसका अभी तक कोई प्रमाण नहीं है.
यशवीर सिंह बताते हैं कि पुलिस ने गीता द्वारा बताए गए अलग-अलग रेप की घटनाओं की जांच करवाई है लेकिन ऐसी कोई भी बात अभी तक प्रमाणित नहीं हुई है.
जब हमने यशवीर सिंह से पूछा कि क्या यह आरोप सही है कि गीता की एफ़आईआर नहीं लिखी गई थी तो उन्होंने बताया कि पूर्व में गीता के ख़िलाफ़ भी कई मामले आए हैं और ख़ुद गीता ने भी कई बार अलग-अलग लोगों पर एफ़आईआऱ दर्ज करवाई है. लेकिन दोनों ही प्रकरण जांच के बाद झूठे पाए गए.
हालांकि उन्होंने ये ज़रूर कहा कि मामला संदिग्ध है और अभी भी जांच के दायरे में है.
गांव वालों की प्रतिक्रिया
जिस वक़्त हम श्यामपुरजट्ट गांव पहुंचे, गांव लगभग ख़ाली था. एक गुमटी पर कुछ लोग मौजूद थे जिनसे हमने गीता-विनोद-भुवन के बारे में पूछा तो उन्होंने पहले तो बात करने से इनक़ार दिया लेकिन पहचान ज़ाहिर न करने का आश्वासन देने पर बात की.
मार्च 2014: "हमारा अभियान स्पष्ट है, बिहार को विशेष राज्य का दर्जा मिलना चाहिए."
अगस्त 2015: "बिहार को विशेष राज्य का दर्जा नहीं देना मोदी सरकार का धोखा."
अगस्त 2016: "जब तक बिहार जैसे पिछड़े राज्य को विशेष दर्जा नहीं दिया जाएगा, राज्य का सही विकास संभव नहीं है."
अगस्त 2017: "पीएम मोदी के मुकाबले कोई नहीं", पार्टी ने इस दौरान विशेष दर्जा के मुद्दे पर अघोषित चुप्पी साधी!
मई 2019: "ओडिशा के साथ-साथ बिहार और आंध्र प्रदेश
बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के मुद्दे पर नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जदयू) का स्टैंड पिछले पांच सालों में कुछ इस तरह बदला है.
इस दौरान बिहार की सत्ता पर नीतीश कुमार ही काबिज़ रहे, हालांकि केंद्र में सरकारें बदलीं और राज्य में उनकी सरकार के सहयोगी भी.
संयोग यह रहा कि जब भी जदयू विशेष दर्जा के मुद्दे पर आक्रामक हुई, केंद्र और राज्य में अलग-अलग गठबंधन की सरकारें रहीं और जब दोनों जगहों पर एनडीए की समान सरकार बनी तो पार्टी ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली.
अब लोकसभा चुनाव के छह चरण बीत जाने के बाद पार्टी ने एक बार फिर से राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने का राग अलापा है.
जदयू के महासचिव और प्रवक्ता केसी त्यागी ने इस बार बिहार के साथ-साथ ओडिशा और आंध्र प्रदेश को भी विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग की है.
उन्होंने सोमवार को एक बयान जारी कर कहा, "साल 2000 में बिहार के विभाजन के बाद राज्य से प्राकृतिक संसाधनों के भंडार और उद्योग छिन गए. राज्य का विकास जैसे होना चाहिए था, नहीं हुआ. अब समय आ गया है कि केंद्रीय वित्त आयोग इस मुद्दे पर फिर से विचार करे."
फ़िलहाल केंद्र और राज्य में समान गठबंधन की सरकार है और लोकसभा चुनाव चल रहे हैं. ऐसे में जदयू के इस बयान से राजनीतिक गलियारों में हलचल मच गई है. तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे हैं.
19 मई को अंतिम चरण में बिहार की आठ सीटों पर मतदान होने हैं. और नीतीश कुमार के विरोधियों का कहना है कि वो एक बार फिर पलटी मारने की तैयारी कर रहे हैं.
वहीं जानकार इसे "सुविधा की राजनीति" के तौर पर देख रहे हैं. हालांकि जदयू इन सभी अशंका और आरोपों को खारिज कर रही है और भाजपा के साथ अपने रिश्ते को कायम रखने की प्रतिबद्धता जता रही है.
केसी त्यागी ने बीबीसी से कहा कि वे ओडिशा के साथ-साथ आंध्र प्रदेश को भी विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने के समर्थक हैं, जिसकी हालत बंटवारे के बाद बिगड़ गई और जगनमोहन रेड्डी के विशेष राज्य के दर्जे की मांग का भी समर्थन करते हैं.
हाल ही में फणी तूफ़ान ने ओडिशा को काफी नुकसान पहुंचाया, इसके बाद वहां के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने केंद्र से राज्य को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग उठाई.
वहीं, आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी तेलुगू देशम पार्टी और विपक्ष के नेता जगनमोहन रेड्डी भी राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग पहले से करते रहे हैं.
इसी मुद्दे पर पिछले साल मार्च के महीने में तेलगू देशम पार्टी केंद्र में एनडीए गठबंधन से अलग हो गई थी जो कि अटल बिहारी वाजपेयी के दौर से ही एनडीए के साथ रही थी.
केसी त्यागी के इस बयान पर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने नीतीश कुमार पर निशाना साधते हुए एक बार फिर पलटी मारने की आशंका जताई है.
पार्टी प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने बीबीसी से कहा, "जनता के मन में जो संशय हैं, उसकी पृष्ठभूमि तैयार हो रही है. पलटी मारना नीतीश कुमार की फितरत है, उन्हें इसका अनुभव प्राप्त है. जदयू को लग रहा है कि देश में भाजपा की सरकार नहीं लौटने वाली है, इसलिए वो यह मुद्दा उठा रहे हैं."
नवंबर 2015 में बिहार में जदयू ने राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर राज्य में तीसरी बार सरकार बनाई थी. जुलाई 2017 में जदयू ने आरजेडी का साथ छोड़ एनडीए में फिर से आने का फ़ैसला किया था तब से इस मांग को लेकर वो ख़ामोश थी.
चुनाव के आख़िरी चरण में जदयू की इस मांग को नीतीश कुमार की दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर भी देखा जा रहा है.
जानकारों का मानना है कि विशेष राज्य के मुद्दे को फिर से उठना भाजपा को असहज स्थिति में डाल सकता है क्योंकि पार्टी के बड़े नेता और वित्तमंत्री अरूण जेटली पहले ही विशेष दर्जे की मांग को ख़ारिज करते हुए कह चुके हैं कि ऐसी मांगों का दौर समाप्त हो चुका है.
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राजद का आरोप सही साबित होगा और जदयू भी टीडीपी की राह चलेगी, इस सवाल पर केसी त्यागी कहते हैं, "हम भाजपा के साथ गठबंधन भी रखेंगे और अपनी मांग भी जारी रखेंगे. हमारी यह मांग बहुत पुरानी है. 2004 से यह मांग हम कर रहे हैं. नया प्रसंग नवीन पटनायक के बयान के बाद शुरू हुआ है, हमने अपनी मांग को सिर्फ़ दोहराया है."
लेकिन भाजपा अब आपकी सहयोगी है, फिर क्यों नहीं मिला विशेष राज्य का दर्जा, इस सवाल का जवाब केसी त्यागी थोड़ी खीझ के साथ देते हैं, "अभी चुनाव चल रहा है, आप कैसी बात कर रहे हैं कि जैसे आज हमने मांग उठाई और कल को दर्जा मिल जाएगा. ज़रूरी नहीं है कि हर मांग मानी जाए, ज़रूरी नहीं है कि हम हर मांग को उठाना छोड़ दे."
को भी मिले विशेष राज्य का दर्जा."
Wednesday, April 10, 2019
'पीएम नरेंद्र मोदी' पर चुनाव आयोग ने लगाई रोक
चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बनी फ़िल्म 'पीएम नरेंद्र मोदी' और अन्य बायोपिक फ़िल्मों पर रोक लगा दी है.
समाचार
एजेंसी एनएआई के मुताबिक़ चुनाव आयोग ने 'पीएम नरेंद्र मोदी', 'एनटीआर लक्ष्मी' और 'उद्यमा सिम्हम' फ़िल्मों के ख़िलाफ़ की गई शिकायतों पर यह
फ़ैसला लिया है.इन फ़िल्मों को लेकर चुनाव आयोग ने कहा है, "इनमें आदर्श आचार संहिता के अनुरूप समान अवसरों को प्रभावित करने की क्षमता है और जब तक आदर्श आचार संहिता लागू है, तब तक इन्हें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या सिनेमा में नहीं दिखाया जाना चाहिए. "
जिन फ़िल्मों पर रोक लगाई गई है, उनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बनी फ़िल्म पीएम नरेंद्र मोदी काफ़ी चर्चा में है.
पिछले कुछ समय से विवादों के केंद्र में रही इस फ़िल्म पर रिलीज़ डेट से ठीक एक दिन पहले रोक लगाई गई है. यह फ़िल्म 11 अप्रैल को रिलीज़ होने वाली थी.
चुनाव आयोग की ओर से लगाई गई यह रोक चुनाव ख़त्म होने तक जारी रहेगी.
यह आरोप लग रहे थे कि चुनाव के समय इस फ़िल्म को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि चकाने के लिए रिलीज़ किया जा रहा है.
हालांकि फ़िल्म से जुड़े लोग इन आरोपों को ग़लत बताते रहे हैं.
निर्देशक उमंग कुमार की इस फ़िल्म में अभिनेता विवेक ओबेरॉय प्रधानमंत्री मोदी का क़िरदार निभा रहे हैं.
इस फ़िल्म का शुरू से ही काफ़ी विरोध हो रहा था. चुनाव आयोग से पहले भी इस फ़िल्म को रिलीज़ किए जाने पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया था.
चुनाव आयोग ने इस मामले में किसी तरह का आदेश जारी नहीं किया था. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने भी आया था.
शीर्ष अदालत ने फ़िल्म पर रोक की मांग करने वाली याचिका को यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया था कि इससे आचार संहिता का उल्लंघन हो रहा है या नहीं, यह देखना चुनाव आयोग का काम है.
मंगलवार को आए सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद गेंद चुनाव आयोग के पाले में आ गई थी. इसके ठीक एक दिन बाद चुनाव आयोग ने इस बायोपिक पर रोक लगाने का फ़ैसला किया है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन पर बनी यह फ़िल्म पहले 5 अप्रैल को रिलीज़ होनी थी लेकिन बाद में इसकी रिलीज़ डेट आगे खिसका दी गई थी.
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने ओसएसडी (ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) प्रवीण कक्कड़ को लेकर विवाद में हैं.
आयकर
विभाग ने कक्कड़ के इंदौर स्थित घर में सात अप्रैल को तड़के सवा तीन बजे रेड मारी थी. कक्कड़ ने बीबीसी से कहा कि उनका परिवार सो रहा था तभी उनके
घर के दो दरवाज़े तोड़ आईटी डिपार्टमेंट के अधिकारी घुस गए और घर की तलाशी
ली. आयकर विभाग की इस छापेमारी के बाद प्रदेश में विपक्षी भारतीय जनता पार्टी आक्रामक हो गई और मुख्यमंत्री कमलनाथ पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का आरोप लगाया. आख़िर प्रवीण कक्कड़ के घर से आयकर विभाग ने क्या ज़ब्त किया?
आठ अप्रैल की रात नौ बजकर 23 मिनट पर इनकम टैक्स इंडिया ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर बताया, ''मध्य प्रदेश में हुई छापेमारी में संगठित अवैध धंधा सामने आया है. राजनीति, कारोबार और सरकारी सेवा से जुड़े अलग-अलग व्यक्तियों के पास से क़रीब 281 करोड़ रुपए बरामद किए गए हैं जिनका कोई हिसाब नहीं है.''
सबसे दिलचस्प है कि आयकर विभाग से क़रीब दस घंटे पहले मध्य प्रदेश में बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय ने एक ट्वीट किया. उस ट्वीट में कैलाश विजयवर्गीय ने कहा है, ''मप्र मे तबादला एक्सप्रेस पटरी से उतरने के कारण दुर्घटनाग्रस्त. जान का कोई नुक़सान नहीं लेकिन 281 करोड़ के माल के नुक़सान का अनुमान.''
विजयवर्गीय के इस ट्वीट को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि आख़िर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के आधिकारिक बयान से पहले कैलाश विजयवर्गीय को 281 करोड़ का आँकड़ा कहां से मिला? कांग्रेस का कहना है कि विजयवर्गीय के ट्वीट से साफ़ है कि यह रेड केंद्र सरकार के इशारे पर राजनीति से प्रेरित है.
प्रवीण कक्कड़ के घर से आयकर विभाग के अधिकारी क्या लेकर गए? कक्कड़ ने बीबीसी से कहा, ''मेरे घर से वो कुछ भी नहीं लेकर गए. न कोई नक़दी ले गए और न ही जूलरी. उन्हें कोई नक़दी नहीं मिली थी. जो जूलरी मिली उसके भी हिसाब थे. हमारे पास कुछ भी बेहिसाब नहीं था. हमने सबके दस्तावेज़ दिखाए हैं.''
प्रवीण कक्कड़ ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक याचिका दाख़िल की है कि उनके घर में आयकर विभाग ने उन्हें अपमानित करने के लिए रेड मारी है और यह राजनीति से प्रेरित है. हाईकोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया है और कक्कड़ की तरफ़ से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल कोर्ट में दलील देंगे.
प्रवीण कक्कड़ के बेटे का मध्य प्रदेश में बड़ा कारोबार है. वो सिक्यॉरिटी गार्ड एजेंसी, तीर्थाटन और कंप्यूटर से जुड़े कारोबार करते हैं. इसके साथ ही कक्कड़ परिवार की बड़ी कमाई प्रॉपर्टी के रेंट से भी है. कक्कड़ का कहना है कि इंदौर संभाग में आयकर विभाग ने उन्हें सबसे ज़्यादा कर चुकाने के लिए सम्मानित भी किया है.
कांग्रेस के मध्य प्रदेश प्रवक्ता पंकज चतुर्वेदी कहते हैं कि प्रवीण कक्कड़ के पास अपनी संपत्तियों का पूरा हिसाब है. वो कहते हैं, ''प्रवीण कक्कड़ ने सारे दस्तावेज़ दिखा दिए हैं. कुछ भी अवैध नहीं मिला है. बीजेपी नेता ने आयकर विभाग से पहले ही रेड में मिली रक़म का आँकड़ा कैसे बताया? साफ़ है कि यह छापा राजनीति से प्रेरित है. कक्कड़ को आयकर विभाग ने ही सम्मानित किया है. आयकर विभाग को अब चुनाव के वक़्त अचानक रेड की ज़रूरत क्यों पड़ी?''
Friday, March 8, 2019
مؤذن " أخرس" في مساجد مصر.. ما القصة؟
"حصل شخص أخرس على وظيفة في وزارة الأوقاف المصرية كمؤذن في أحد المساجد مقابل راتب شهري". اندهش مصريون بهذا
التصريح
لم يكتف نعمان بذلك التصريح إذ قال خلال لقاء معه في برنامج "كل يوم" مع
الإعلامي وائل الأبراشي إن الواسطة والرشوة مكنتا المؤذن من الحصول على
عمل رسمي بطرق غير قانونية. وأكد نعمان وجود مستندات في وزارة الأوقاف تثبت صحة ما يقوله. ولم تمر ساعات على تصريحاته حتى ردت وزارة الأوقاف ببيان نفت فيها تعيين مؤذن أخرس بمساجدها.
وعلى مواقع التواصل الاجتماعي، فتح حديث نعمان عن المؤذن الأخرس النقاش حول حجم الفساد المستشري داخل المؤسسات المصرية.
وفيما وصف البعض كلام نعمان بالافتراء، علق أحدهم قائلا: الوساطة والمحسوبية في كل مكان وده وضع بلدنا."
ودعا نشطاء الدولة إلى تفعيل آليات المراقبة و المحاسبة لمحاربة الفساد والمحسوبية التي تحد من طموحات المواطن وثقته بالمؤسسات الحكومية، على حد قولهم.
في حين حذر آخرون من تداول الأخبار المغلوطة، فكتب أحدهم:" أولا أشك في كلامك بنسبة تصل إلي ٩٩ بالمائة ولو عندك دليل هاته والدليل يكون من دفتر الحضور والانصراف للمسجد لتكن عندكم الشجاعة واعتذروا وبلاش أخبار مغلوطة."
وتعد وزارة الأوقاف من أكبر وأغنى بين المؤسسات الحكومية في مصر، إذا فاقت أملاكها تريليون و37 مليار جنيه مصري، وفقا لما أعلنه مجلس إدارة هيئة الأوقاف العام الماضي.
وتهتم الوزارة بشؤون الدعوة الإسلامية، تشمل أنشطتها العناية بالمساجد ورعاية الأيتام و مراجعة الأمور الفقهية.
"ألو أين بوتفليقة؟" ..."أعيدوا لنا
بوتفليقة"... يبدو أن العاملين في مستشفى جنيف الجامعي قضوا ليلة صعبة
بعدما أغرقهم جزائريون بالاتصالات للسؤال عن صحة الرئيس المنتهية ولايته عبد العزيز بوتفليقة.
بينما يرقد الرئيس الجزائري في المستشفى بعيدا عن أعين الصحفيين وهتافات المحتجين، قرر البعض الوصول إليه بطريقتهم الخاصة.فقد نشر ناشطون جزائريون عبر فيسبوك تسجيلات لمحادثات طريفة جمعتهم بموظفي المستشفى السويسري.
وظهر أحد المتصلين وهو يطلب بطريقة ساخرة من موظفي الاستقبال بالمستشفى التخلي عن علاج بوتفليقة أو الإفصاح عن طبيعة مرضه لخدمة الشعب الجزائري في احتجاجاته.
وبحسب مواقع سويسرية، فقد تلقى مستشفى جنيف الجامعي أكثر من 6 آلاف اتصال منذ مساء الأربعاء.
يأتي هذا في ظل تضارب الأنباء حول صحة الرئيس الجزائري وعدم صدور أي تأكيد أو نفي من مستشفى جنيف الجامعي حول ما يتم تداوله عبر مواقع التواصل الاجتماعي.
وتفنن المتظاهرون الجزائريون، على مدى الأيام الماضية، في ابتداع أساليب متنوعة للاحتجاج في الشارع وفي العالم الافتراضي.
ورفع شبان في مظاهراتهم لافتات "تندد بالأوضاع المزرية في البلاد" و صورا كاريكاتورية لبعض المسؤولين.
وعلق أحدهم على تلك الشعارات قائلا: "لو كنت مسؤولا ورأيت كل هذه الشعارات والإهانات لاستقلت على الفور".
واستعان المشاركون في المظاهرات الطلابية بصور وعبارات ترددت في أفلام أجنبية ورسوم متحركة، للتعبير عن رفضهم لترشيح بوتفليقة لولاية جديدة.
من أبرز الشعارات التي رفعها طلاب الجامعات لافتة كتب عليها
كما تميزت بعض الشعارات بالرومانسية، إذ رفعت إحدى المتظاهرات لافتة كتبت عليها :" أريده مثل بوتفليقة كلما طلبت منه الرحيل زاد تعلقا" و ذيلت اللافتة بعبارة " لا للعهدة 5 ".
وعبر مواقع التواصل الاجتماعي، جدد الجزائريون دعواتهم للتظاهر غدا من خلال تدشين #حراك_8_مارس. وشددوا على ضرور الالتزام بالسلمية حتى تتحق مطالبهم برحيل بوتفليقة.
ولجأ كثيرون لتطبيق "التيكتوك" لمحاكاة تصريحات السياسيين الجزائريين.
وتعني "الطلبة يتمنون حكومة ورئيسا جديدين". اقتبست كلمة Accio من تعويذة سحرية في سلسلة هاري بوتر، إذ كان يرددها عندما كان يتنمى حدوث شيء .
وفي حديث لبي بي سي يقول المتظاهر حسن بن مزون إن " الفكاهة متجذرة في الشعب الجزائري الذي لطالما اعتمد السخرية كوسيلة للتغلب على المحن أو للدفاع عن نفسه أمام فساد المسؤولين."
و يضيف " تنوعت الشعارات التي رفعناها بين الجد والهزل. وبالرغم من أن الجدية كانت طاغية إلا أن بعضنا استرجع مشاهد من أفلام الكرتون وحولها إلى شعارات تنتقد الأوضاع التي آلت إليها البلاد."
ويختم"ما نرمي إليه كطلاب جامعيين لا يختلف عن باقي مطالب الشعب الجزائري، فما نطلبه هو رحيل بوتفليقة وتغيير النظام وتسليم المشعل للشباب. ولن نتراجع عن تلك المطالب."
الذي أدلى به عضو لجنة الفتوى العليا بالأزهر، سعيد نعمان في مقابلة متلفزة.
Friday, January 18, 2019
أول تعليق من التحالف الدولي على تفجير منبج
في أول تعليق على الموضوع، أكد التحالف الدولي بقيادة واشنطن
أنه يجمع معلومات حول التفجير الذي هز اليوم الأربعاء مدينة منبج شمال
سوريا وأودى بأرواح عسكريين أمريكيين.
- البنتاغون: مقتل 4 أمريكيين جراء التفجير في منبج السورية
أعلنت الداخلية المصرية، اليوم الأربعاء، عن القضاء على "خلية
إرهابية" في مدينة العريش شمال شرق شبه جزيرة سيناء في عملية أمنية أسفرت
عن مقتل 5 من عناصر المجموعة.
وقالت الوزارة، في بيان صدر عنها بهذا الصدد: تمكن قطاع
الأمن الوطني من رصد بؤرة إرهابية تخطط لتنفيذ سلسلة من العمليات الإجرامية
ضد المنشآت الهامة والحيوية وشخصيات هامة بإحدى المناطق النائية بمدينة
العريش".وأضافت الوزارة: "بمداهمة تلك البؤرة بادرت العناصر الإرهابية بإطلاق النيران بكثافة على قوات الشرطة وتم التعامل معها مما أسفر عن مصرع 5 والعثور بحوزتهم على 3 بنادق آلية (1 بندقية خرطوش، 1 عبوة متفجرة، 1 حزام ناسف)".
وتشهد محافظة شمال سيناء حملة عسكرية كبيرة تشنها القوات المصرية ضد جماعات مصنفة "إرهابية" على رأسها "ولاية سيناء"، المعروفة سابقا، قبل مبايعتها لتنظيم "داعش"، باسم "أنصار بيت المقدس"، والمسؤولة عن هجمات عديدة على عناصر الأمن أو السياسيين في المنطقة.
وسيحتاج هذا الطلب أولا إلى موافقة مجلس الأمن الدولي، حيث تملك واشنطن حق الفيتو كأحد الأعضاء الدائمين، وفي حال دعم المجلس الطلب الفلسطيني ستطرح المسألة على التصويت في الجمعية العامة للأمم المتحدة.
وقال وزير الخارجية الفلسطيني رياض المالكي، في تصريح صحفي أدلى به أمس الثلاثاء،: "نعلم أننا سنواجه الفيتو من الولايات المتحدة، لكن هذا لن يمنعنا من تقديم طلبنا"، مؤكدا أن الفلسطينيين ينوون إطلاق حملة من أجل حشد التأييد داخل مجلس الأمن.
وسبق أن تقدم الفلسطينيون بطلب للحصول على عضوية الأمم المتحدة عام 2011، لكنه لم يصل إلى مجلس الأمن من أجل طرحه للتصويت.
ويحظى الفلسطينيون حاليا بصفة عضو مراقب في المنظمة العالمية، وسيمنحهم الحصول على العضوية الكاملة اعترافا عالميا بدولتهم.
وتسلم الرئيس الفلسطيني محمود عباس أمس في مقر الأمم المتحدة رئاسة "مجموعة الـ77 + الصين"، لعام 2019، وهي أكبر تكتل دولي ضمن المنظمة العالمية
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